मुझे आज भी वोह दिन याद आते हैं जब वरुण बहुत खुश मिजाज़ लेकिन थोड़ा शर्मीला हुआ करता था. जब कभी हम जयपुर से लोहियाँ जाया करते थे वोह भागा हुआ आता था और पाँव छूकर बाहर खेलने भाग जाता था. पढ़ाई लिखाई में भी अच्छा था, हैंडराइटिंग भी अच्छी थी. लेकिन घर के हालात अच्छे नहीं थे. इसके पापा को शराब पीने की लत लग गई, कामकाज छोड़ दिया, घर में खाने के लिए पैसे नहीं थे, फीस के लिए भी पैसे नहीं थे. इसके नाना जी हर महीने जयपुर से पैसे भेजते थे लेकिन वोह पैसे भी शराब में खर्च कर दिए जाते. वरुण की पढ़ाई की तरफ किसी ने कोई ध्यान नहीं दिया और ऐसे हालात में वोह पढ़ाई में कमज़ोर होता गया और फिर दसवीं के एग्जाम में फेल हो गया. फिर कोविड का टाइम सबसे ज़्यादा खतरनाक आया. इसके पापा की डेथ हो गई और यह झटका उसके लिए सबसे ज़्यादा पीड़ादायक रहा और वरुण उस स्टेज में पहुँच गया.
किसी से भी बात करना छोड़ दिया, गांव में घूमता रहता, कहीं भी कुछ उठा के खा लेता. इसके पापा की डेथ के कुछ दिन बाद इसके नाना जी की भी कोविड की वजह से डेथ हो गई और उस समय इसके नाना के पास कोई नहीं था नानी भी कोविड की वजह से हॉस्पिटल में एडमिट थी और हम दोनों भी कोविड की वजह से हॉस्पिटल में एडमिट थे. इसलिए वरुण और उसकी मम्मी को लोहियाँ से जयपुर आना पढ़ा और नाना का अंतिम संस्कार वरुण और उसकी मम्मी को अकेले करना पढ़ा. पहिले वरुण के पापा और फिर नाना की डेथ ने वरुण और उसकी मम्मी के दिमाग़ बहुत असर हुआ और यह दोनों इस हालात में पहुँच गए. तब से इसकी नानी बेड रिडन है.
वरुण और उसकी मम्मी अपनी नानी के साथ रहे हैं और इनका और कोई आमदनी का साधन नहीं है. इसकी नानी की देखभाल के लिए 24 घंटे नर्स रखनी पढ़ती है और वरुण और उसकी मम्मी के लिए पिछले चार पांच साल से साइकोत्रिस्ट का इलाज करवाना पढ़ रहा है. कोशिश कर रहें हैं किसी तरह वरुण अपना ख्याल रखने के काबिल हो जाय. इसलिए साइकोत्रिस्ट की सलाह से हमने वरुण को APAR में भेजना शुरू किया और APAR में जाने के बाद वरुण के व्यवहार में इतनी इम्प्रूवमेंट देख कर हमें इतनी ख़ुशी हो रही है की उसका बयान करना मुश्किल है. हमें लगता है की APAR के टीचर्स, मैनेजमेंट और स्टाफ की डेडिकेशन ज़रूर वरुण की लाइफ में सुधार लाएगी और वोह अपने आप को सँभालने के काबिल बन पायेगा.
मेरा काम सुबह से ही शुरू हो जाता है इसकी नानी का सुबह उठते ही नर्स को फोन करके रात के हालात का पता करना, कौनसी दवाई दी , BP और ऑक्सीजन लेवल कैसा रहा. उनके खाने के लिए क्या बनाना है, वरुण को टाइमली उठाना और त्यार करवाना, उसको खाने के लिए क्या देना और साथ में टिफ़िन में क्या देना. यह सब कुछ यहाँ गुडगाँव में बैठ कर फ़ोन और कैमरे के दुवारा अरेंज करना और साथ साथ में यहाँ अपने घर की देख भाल, खाना त्यार करना और घर के सारे काम करना इत्यादि.
साथ साथ नर्सिंग स्टाफ भेजनें वाली एजेंसी से संपर्क में रहना, कब कौनसी नर्स भेज रहें हैं. समय समय पर कैमरे से चेक करना की नर्सिंग स्टाफ ठीक से काम कर रहा है या नहीं. वरुण और उसकी मम्मी को साइकोत्रिस्ट की दवाई चेक करना की टाइम पर दी जा रही है या नहीं. यह मेरा रूटीन लगभग मैं जब से शादी करके जालंधर से जयपुर आई तब से ही चालू हो गया था.
शादी के बाद मै अपने झेठ झेठानी के पास आई थी और मेरे पापा ने मेरे झेठ जी जिन्हे हम भाजी कहा करते थे को बोला था की इस बच्ची को मैं आपके पास भेज रहा हूँ इसे आप कभी अपने से अलग मत करना और वोह भी हमेशा यही कहते थे तुम्हारे दो पापा हैं एक जलन्दर में और एक यहाँ जयपुर में और मैंने भी भैया और भाभी जी को पापा और मम्मी ही समझा है. हमारे बढ़े भैया जो हमारे ऊपर ज़ुमेवारी छोड़ गए हैं उसे हम दोनों मिल कर पूरी तन्मयता से निभाने की कोशिश कर रहे हैं.
ईश्वर हमें इतनी हिम्मत और ताकत दें ताकि हम इनकी देखभाल ठीक से कर सकें और वरुण और उसकी मम्मी को इस काबिल बना सकें को वोह दोनों अपना ध्यान रख सकें और इस काम में हमें जो सहयोग APAR के टीचर्स, स्टाफ और मैनेजमेंट से मिल रहा है उसके लिए हम उनके तहदिल से शुक्रगुजार हैं.
